बलूचिस्तान गणराज्य का उदय: भारत और संयुक्त राष्ट्र से मान्यता की मांग
भूमिका
पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिम में स्थित बलूचिस्तान एक ऐसा क्षेत्र है जो लंबे समय से अपने अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करता आ रहा है। हाल ही में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) द्वारा “बलूचिस्तान लोकतांत्रिक गणराज्य” की घोषणा और भारत तथा संयुक्त राष्ट्र से आधिकारिक मान्यता की मांग ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। यह लेख बलूचिस्तान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय प्रभावों पर विस्तृत प्रकाश डालता है।
1. बलूचिस्तान का इतिहास और पाकिस्तान के साथ जबरन विलय
1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय बलूचिस्तान स्वतंत्र था। कलात की रियासत के रूप में यह क्षेत्र लगभग 227 दिनों तक स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में रहा। लेकिन 1948 में पाकिस्तान ने सैन्य कार्रवाई के जरिए इस क्षेत्र का जबरन विलय कर लिया। बलूच लोगों के अनुसार यह विलय स्वैच्छिक नहीं बल्कि ज़बरदस्ती किया गया था। तभी से बलूच लोगों में स्वतंत्रता की भावना और पाकिस्तान विरोधी भावनाएं गहरी होती गईं।
2. बलूच स्वतंत्रता संग्राम: शांतिपूर्ण से सशस्त्र संघर्ष तक
पिछले कई दशकों से बलूचिस्तान में विभिन्न संगठन जैसे BLA, BRA और BLF सक्रिय हैं जो बलूच जनता के अधिकारों और आत्मनिर्णय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इन संगठनों ने पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों, रेलवे स्टेशनों और सरकारी संपत्तियों को निशाना बनाते हुए सशस्त्र संघर्ष को तेज किया है। उनका तर्क है कि पाकिस्तान सरकार और सेना बलूच संसाधनों का दोहन कर रही है जबकि स्थानीय जनता उपेक्षित है।
3. हेरोफ 2.0 अभियान और सैन्य कार्रवाइयों की तीव्रता
2025 की शुरुआत में BLA ने “हेरोफ 2.0” नामक सैन्य अभियान के तहत पाकिस्तान के कई इलाकों में जोरदार हमले किए। इन हमलों में क्वेटा, ओरमारा, पंजगुर, नुश्की और सिबी जैसे इलाकों में 58 से अधिक ठिकानों पर हमले किए गए। रिपोर्ट्स के अनुसार BLA ने कई रणनीतिक ठिकानों पर कब्जा किया और पाकिस्तान सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
4. बलूचिस्तान लोकतांत्रिक गणराज्य की घोषणा
मई 2025 में BLA ने खुद को एक स्वतंत्र देश घोषित करते हुए “बलूचिस्तान लोकतांत्रिक गणराज्य” की घोषणा की। यह घोषणा बलूच नेता मीर यार बलोच द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से की गई। उन्होंने बलूच गणराज्य को लोकतांत्रिक, मानवाधिकारों का सम्मान करने वाला, और शांतिपूर्ण राष्ट्र बताते हुए कहा कि वे विश्व के सभी देशों से मान्यता चाहते हैं।
5. भारत और संयुक्त राष्ट्र से अपील
बलूच नेताओं ने भारत और संयुक्त राष्ट्र से अनुरोध किया है कि वे इस नवघोषित देश को मान्यता दें। उनकी मांगें इस प्रकार हैं:
- नई दिल्ली में बलूच दूतावास खोलने की अनुमति।
- बलूच पासपोर्ट, मुद्रा और नागरिक पहचान पत्र जारी करने में भारत का सहयोग।
- संयुक्त राष्ट्र महासभा में बलूचिस्तान की स्वतंत्रता पर विशेष सत्र बुलाना।
बलूच जनता भारत को एक नैतिक समर्थनदाता के रूप में देखती है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों का समर्थक है और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर जैसे मामलों पर सख्त रुख रखता है।
6. पाकिस्तान की प्रतिक्रिया
पाकिस्तान सरकार ने BLA और अन्य संगठनों को आतंकी करार देते हुए इन गतिविधियों की तीव्र आलोचना की है। सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों पर बलूच स्वतंत्रता की खबरों को सेंसर किया जा रहा है। पाकिस्तान ने भारत को चेतावनी दी है कि यदि उसने बलूचिस्तान को किसी भी रूप में समर्थन दिया तो यह उसके लिए गंभीर परिणाम ला सकता है।
7. अंतरराष्ट्रीय मीडिया और चुप्पी
बलूचिस्तान की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सीमित ही कवरेज देखने को मिली है। अमेरिका, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठनों ने अब तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। यह स्थिति चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) में इन देशों के निवेश और रणनीतिक हितों के कारण हो सकती है।
8. चीन की भूमिका और बलूच विरोध
चीन द्वारा बलूचिस्तान के ग्वादर पोर्ट और CPEC प्रोजेक्ट्स में किए गए भारी निवेश के चलते बलूच संगठन चीन के खिलाफ भी आक्रामक हैं। उनका मानना है कि CPEC के जरिए पाकिस्तान और चीन बलूचिस्तान की संपत्ति लूट रहे हैं। इसलिए BLA ने कई बार चीनी कर्मचारियों और ठिकानों को भी निशाना बनाया है।
9. भविष्य की संभावनाएं
बलूचिस्तान की स्वतंत्रता की राह कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं। यदि भारत, संयुक्त राष्ट्र और अन्य लोकतांत्रिक देश बलूच जनभावनाओं का समर्थन करते हैं तो:
- बलूच जनता को आत्मनिर्णय का अधिकार मिल सकता है।
- पाकिस्तान द्वारा हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों पर अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई संभव है।
- एक नया लोकतांत्रिक राष्ट्र अस्तित्व में आ सकता है।
निष्कर्ष
बलूचिस्तान का स्वतंत्रता संग्राम सिर्फ एक भू-राजनीतिक मसला नहीं बल्कि एक मानवीय अधिकारों का प्रश्न है। बलूच लोगों की संस्कृति, इतिहास और पहचान को बनाए रखने के लिए उनकी आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सुना जाना चाहिए। भारत और संयुक्त राष्ट्र को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करते हुए बलूचिस्तान को उसका न्यायपूर्ण अधिकार देना चाहिए।