ऑपरेशन सिंधु पर राहुल गांधी की आलोचना – राजनीतिक विरोध या राष्ट्रहित के विरुद्ध कदम?
हाल ही में भारत द्वारा किए गए “ऑपरेशन सिंधु” की सफलता पर संदेह जताते हुए कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की टिप्पणियाँ सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में ज़बरदस्त आलोचना का कारण बन गई हैं। जहाँ एक ओर भारत ने पाकिस्तान की सीमा में घुसकर 25 मिनट के भीतर 9 आतंकी ठिकानों को तबाह कर दिया, वहीं दूसरी ओर राहुल गांधी ने केंद्र सरकार और विदेश मंत्री एस. जयशंकर पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
राहुल गांधी का आरोप है कि ऑपरेशन से पहले ही विदेश मंत्री जयशंकर ने पाकिस्तान को हमले की जानकारी दे दी थी। उनका कहना है कि भारत और पाकिस्तान के सैन्य निदेशकों (DGMO) के बीच जो बातचीत हुई थी, उसमें इस हमले का ज़िक्र कर दिया गया था जिससे पाकिस्तान सतर्क हो गया। लेकिन रक्षा विशेषज्ञों और स्वतंत्र पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह राहुल गांधी की गंभीर गलतफहमी है और वह कूटनीतिक प्रक्रिया को ठीक से नहीं समझते।
पहलगाम में टूरिस्ट बस पर हुए आतंकी हमले के कुछ ही दिनों बाद केंद्र सरकार ने सभी दलों की बैठक बुलाई थी। कांग्रेस समेत सभी दलों ने राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर सरकार को समर्थन देने का वादा किया था। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेनाओं को पूर्ण स्वतंत्रता दी, जिसका परिणाम ऑपरेशन सिंधु के रूप में सामने आया।
इस सफल ऑपरेशन के बाद, राहुल गांधी ने फिर से राफेल विमान सौदे को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए। उन्होंने पूछा कि ऑपरेशन सिंधु के दौरान भारत ने कितने फाइटर जेट खोए? सरकार का मानना है कि यह सवाल केवल राफेल सौदे पर फिर से शंका उत्पन्न करने और राजनीतिक लाभ लेने के लिए उठाया गया है।
राहुल गांधी इससे पहले भी राफेल डील को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे चुके हैं, जहाँ से उनके सभी आरोप खारिज कर दिए गए थे। अब फिर से ऑपरेशन सिंधु की आड़ में वही मुद्दा उठाना, देश की सैन्य ताकत और रणनीतिक सफलता को कमज़ोर दिखाने जैसा माना जा रहा है।
सोशल मीडिया पर लोग राहुल गांधी की तुलना पाकिस्तान के विपक्षी नेताओं से कर रहे हैं। यहाँ तक कि कुछ पाकिस्तानी चैनलों ने भी हैरानी जताई है कि भारत का विपक्ष अपनी ही सरकार और सेना को इस हद तक कठघरे में खड़ा कर रहा है। कई लोगों का मानना है कि राहुल गांधी की टिप्पणियाँ भारत के बजाय पाकिस्तान के हित में जा रही हैं।
निष्कर्षतः, राहुल गांधी का यह रुख लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका से कहीं आगे जाकर, राष्ट्रीय सुरक्षा को राजनीतिक बहस का हथियार बना देता है। जब पूरा देश सेना के साथ खड़ा है, तब एक राष्ट्रीय नेता का इस तरह का रवैया न केवल असंवेदनशील है, बल्कि उनके नेतृत्व कौशल पर भी सवाल खड़े करता है।