वक्फ अधिनियम में संशोधन मुसलमानों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता: सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की सफाई
हाल ही में वक्फ अधिनियम में किए गए संशोधनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया है कि यह संशोधन मुसलमानों के धार्मिक मामलों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करता।
सरकारी पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि वक्फ कोई धार्मिक नियम नहीं है, बल्कि यह मुसलमानों के समुदाय में विकसित हुआ एक सामाजिक और प्रशासनिक ढांचा है। उन्होंने कहा कि यह इस्लाम की धार्मिक मान्यता या उसके अनिवार्य धार्मिक सिद्धांतों का हिस्सा नहीं है।
वक्फ क्या है?
वक्फ का अर्थ है किसी व्यक्ति द्वारा धार्मिक, सामाजिक या परोपकारी उद्देश्य के लिए अपनी संपत्ति को दान करना, जिसे फिर एक वक्फ बोर्ड या ट्रस्ट के ज़रिए संचालित किया जाता है। इसका उद्देश्य समाज में कल्याणकारी कार्यों को बढ़ावा देना होता है, जैसे कि मस्जिद, स्कूल, अस्पताल, कब्रिस्तान आदि का संचालन।
केंद्र सरकार के अनुसार, वक्फ न तो पूजा-पद्धति का हिस्सा है और न ही इस्लाम का अनिवार्य धार्मिक कार्य। इसलिए वक्फ अधिनियम में संशोधन का धार्मिक स्वतंत्रता से कोई सीधा संबंध नहीं है।
वक्फ अधिनियम में संशोधन क्यों किया गया?
वक्फ संपत्तियों की अनियमितताओं, भ्रष्टाचार, ज़मीन पर अवैध कब्जे और पारदर्शिता की कमी जैसी समस्याएं कई वर्षों से सामने आती रही हैं। इन समस्याओं के समाधान हेतु केंद्र सरकार ने वक्फ अधिनियम में संशोधन कर इसे अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाने की कोशिश की है।
संशोधन में वक्फ संपत्तियों के लीज़ नियमों को स्पष्ट करना, जनकल्याणकारी परियोजनाओं के लिए ज़मीन के उपयोग की प्रक्रिया को परिभाषित करना और वक्फ बोर्डों की निगरानी प्रणाली को मजबूत करना जैसे प्रावधान शामिल हैं।
क्या यह धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप है?
सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि वक्फ अधिनियम का संशोधन किसी पूजा-पद्धति या धार्मिक विश्वास में हस्तक्षेप नहीं करता। चूंकि वक्फ इस्लाम का अनिवार्य धार्मिक अभ्यास नहीं है, इसलिए इस पर किए गए प्रशासनिक संशोधन संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के अंतर्गत नहीं आते।
निष्कर्ष
केंद्र सरकार की यह दलील कि वक्फ एक प्रशासनिक और सामाजिक तंत्र है, न कि धार्मिक क्रिया, इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय यह तय करेगा कि क्या सरकार का यह कदम धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के अनुरूप है, और क्या यह अन्य धार्मिक ट्रस्टों के संचालन को भी प्रभावित करेगा।
यह मामला सिर्फ मुस्लिम समुदाय ही नहीं, बल्कि देश में धार्मिक और परोपकारी ट्रस्टों की भविष्य की संरचना के लिए भी एक मूल्यवान दिशा तय कर सकता है।