चीन और रूस की रक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए अमेरिका ने ‘गोल्डन डोम’ मिसाइल रक्षा योजना की घोषणा की

चीन और रूस की रक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए अमेरिका ने ‘गोल्डन डोम’ मिसाइल रक्षा योजना की घोषणा की

चीन और रूस जैसे महाशक्तियों से बढ़ते सुरक्षा खतरों के बीच, अमेरिका ने अपनी रक्षा नीति को और मजबूत करते हुए एक क्रांतिकारी योजना – “गोल्डन डोम” (Golden Dome) – की घोषणा की है। इस अगली पीढ़ी की मिसाइल रक्षा प्रणाली पर अनुमानित खर्च 175 अरब डॉलर बताया गया है। यह घोषणा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने की, जिन्होंने इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए “आवश्यक और तत्काल” कदम बताया।


मिसाइल रक्षा प्रणाली का महत्व

आधुनिक युग में युद्ध की रणनीतियों में मिसाइल रक्षा प्रणाली एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। चाहे वह इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) हो, हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल (HGV), क्रूज़ मिसाइल हो या AI संचालित ड्रोन हमले, इन सभी खतरों का मुकाबला करने के लिए देशों को बहु-स्तरीय रक्षा तंत्र की आवश्यकता होती है।

अमेरिका इस दिशा में अब तक पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) पर ध्यान केंद्रित करता रहा है। लेकिन बदलते परिदृश्य में अब उसे अधिक उन्नत और त्वरित प्रतिक्रिया देने वाले सिस्टम की जरूरत महसूस हो रही है।


इज़राइल का IRON DOME बना प्रेरणा स्रोत

अमेरिका की इस नई योजना की प्रेरणा इज़राइल की सफल मिसाइल रक्षा प्रणाली IRON DOME से मिली है। इस प्रणाली ने हाल ही में ईरान और हमास द्वारा दागी गई हजारों मिसाइलों को सफलतापूर्वक मार गिराया। एक हमले में IRON DOME ने 5000 से अधिक रॉकेटों को 20 मिनट के अंदर रोककर लाखों नागरिकों की जान बचाई।

ट्रंप ने इसी सफलता को आधार बनाते हुए अमेरिकी संसद में घोषणा की थी कि अमेरिका इससे भी उन्नत मिसाइल रक्षा प्रणाली विकसित करेगा।


क्या है ‘गोल्डन डोम’?

गोल्डन डोम एक अगली पीढ़ी की बहु-स्तरीय, बहु-डोमेन एयर एंड मिसाइल डिफेंस सिस्टम है। इसका उद्देश्य अमेरिकी मुख्य भूमि को हवा, समुद्र और अंतरिक्ष से आने वाले उन्नत खतरों से सुरक्षित रखना है।

इस योजना की प्रमुख विशेषताएं:

  • अंतरिक्ष आधारित सर्विलांस सैटेलाइट, जो दुश्मन की मिसाइलों का तुरंत पता लगा सकेंगी।
  • हाई-स्पीड इंटरसेप्टर मिसाइलें, जो हाइपरसोनिक और क्रूज़ मिसाइलों को मार्ग में ही नष्ट करेंगी।
  • AI और ऑटोमेशन आधारित निर्णय प्रणाली, जो मानव हस्तक्षेप के बिना तुरंत प्रतिक्रिया दे सके।
  • एक एकीकृत कमांड एंड कंट्रोल नेटवर्क, जो तीनों सेनाओं (थल, वायु, नौसेना) और अंतरिक्ष प्रणाली को जोड़ता है।

स्पेस-आधारित रडार और इंटरसेप्टर: गेम चेंजर

गोल्डन डोम की सबसे उल्लेखनीय बात इसकी अंतरिक्ष आधारित निगरानी और प्रतिक्रिया प्रणाली है। जैसे ही कोई मिसाइल दागी जाएगी, सैटेलाइट उसे सेकंडों में पहचान लेंगे और साथ ही इंटरसेप्टर सैटेलाइट उसे अंतरिक्ष में ही नष्ट कर देंगे। यह तकनीक पारंपरिक जमीनी प्रणाली से कहीं अधिक तेज और कारगर मानी जा रही है।


बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियां मैदान में उतरीं

इस योजना के तहत कई शीर्ष अमेरिकी टेक कंपनियों ने भागीदारी की इच्छा जताई है:

  • Palantir – डेटा विश्लेषण और सैन्य इंटेलिजेंस में विशेषज्ञता।
  • Anduril – आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित रक्षा तकनीक में अग्रणी।
  • SpaceX – एलन मस्क की कंपनी, जो इस योजना में उपग्रह प्रक्षेपण और स्पेस इंटरसेप्टर प्रणाली में सहयोग कर सकती है।

इन कंपनियों की भागीदारी इस परियोजना को अत्याधुनिक तकनीकी स्तर तक ले जाएगी।


चीन और रूस ने जताई गंभीर आपत्ति

गोल्डन डोम योजना की घोषणा के बाद रूस और चीन ने एक स्वर में इसकी आलोचना की है। उन्होंने इसे वैश्विक सामरिक संतुलन के लिए खतरा बताया और कहा कि अमेरिका इस योजना के माध्यम से अंतरिक्ष का सैन्यकरण कर रहा है।

रूस का कहना है कि इससे नई हथियारों की दौड़ शुरू हो सकती है, जबकि चीन ने इसे निवारक सिद्धांत के खिलाफ बताया।


ट्रंप की समय सीमा: कार्यकाल में ही पूरा हो मिशन

सूत्रों के अनुसार, ट्रंप ने जनवरी में इस योजना पर हस्ताक्षर करते हुए यह निर्देश दिया कि गोल्डन डोम उनके कार्यकाल के भीतर प्रारंभिक चरण में कार्यरत हो जाए। पेंटागन ने तुरंत इसकी परीक्षण प्रक्रिया शुरू कर दी है।

इस प्रणाली के तहत इंटरसेप्टर, सैटेलाइट, सेंसर और कंट्रोल नेटवर्क का एकीकृत परीक्षण किया जा रहा है।


क्यों जरूरी है गोल्डन डोम?

ट्रंप और पेंटागन का मानना है कि चीन और रूस के पास पहले से ही ऐसी हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं, जो आवाज से 20 गुना तेज गति से महाद्वीपों को पार कर सकती हैं। ऐसे में एक आम बैलिस्टिक डिफेंस सिस्टम पर्याप्त नहीं है।

गोल्डन डोम इस चुनौती का उत्तर है – एक 360-डिग्री सुरक्षा कवच, जो अमेरिका की रक्षा के साथ-साथ वैश्विक रणनीतिक बढ़त भी देगा।


भविष्य की दिशा: तकनीक बनाम कूटनीति

जहाँ अमेरिका इस योजना को अपनी सुरक्षा का मूल मान रहा है, वहीं कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इसे सैन्यीकरण की दौड़ को बढ़ावा देने वाला कदम मानते हैं। कुछ देशों को आशंका है कि यह योजना आगे चलकर दुनिया को एक स्थायी युद्ध क्षेत्र में बदल सकती है।

Facebook Comments Box