तमिलनाडु में जातिगत संरचना पर राज्यपाल आर. एन. रवि की टिप्पणी – एक विवेचनात्मक दृष्टिकोण

तमिलनाडु में जातिगत संरचना पर राज्यपाल आर. एन. रवि की टिप्पणी – एक विवेचनात्मक दृष्टिकोण

हाल ही में तमिलनाडु के शिवगंगा ज़िले के देवकोट्टई के पास “कण्डदेवी थेरोत्सव और सामाजिक समरसता” नामक एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में राज्यपाल आर. एन. रवि ने विशेष अतिथि के रूप में भाग लिया और अपने भाषण के दौरान कहा कि “मेरे अनुभव में, तमिलनाडु जैसा जातियों, उपजातियों और उप-समूहों से भरा कोई अन्य राज्य मैंने नहीं देखा।” इस बयान ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में व्यापक बहस को जन्म दिया है।

राज्यपाल ने अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस पार्टी की आलोचना करते हुए कहा कि स्वतंत्रता के बाद सत्ता में आए राजनीतिक दलों ने भी अंग्रेजों की “फूट डालो और राज करो” नीति को ही अपनाया। उन्होंने कहा कि सरकारों का मुख्य उद्देश्य लोगों को जोड़ना होना चाहिए, न कि बांटना।

तमिलनाडु में जातिगत संरचना ऐतिहासिक रूप से गहराई से जुड़ी हुई है। यहाँ की सामाजिक व्यवस्था में हजारों वर्षों से जाति एक अहम भूमिका निभाती रही है – चाहे वह मंदिरों के प्रशासन में हो, पारंपरिक व्यवसायों में हो, या फिर सामाजिक रीति-रिवाजों में। हालाँकि, भारत के सभी राज्यों में जातियाँ हैं, लेकिन तमिलनाडु में जातियों की संख्या, उनकी उपजातियाँ और शाखाएँ विशेष रूप से अधिक और जटिल हैं।

राज्यपाल की इस टिप्पणी को कुछ लोग राजनीतिक दृष्टिकोण से देख रहे हैं। तमिलनाडु की राजनीति में जातिगत समीकरण अक्सर चुनावी रणनीतियों का केंद्र बिंदु होते हैं। कई राजनीतिक दल जाति-आधारित आरक्षण, समूहों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ, और विशेष प्रतिनिधित्व के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने की कोशिश करते हैं। इससे एक ओर हाशिए पर खड़े समुदायों को सशक्तिकरण का अवसर मिला है, लेकिन दूसरी ओर यह जाति पहचान की राजनीति को भी मजबूत करता है।

राज्यपाल के इस बयान की आलोचना करने वाले यह भी कहते हैं कि इस प्रकार की टिप्पणियाँ राज्य में सामाजिक न्याय आंदोलनों को कमतर आंकने का प्रयास हैं। विशेष रूप से द्रविड़ आंदोलन ने जातिवाद के खिलाफ ज़ोरदार लड़ाई लड़ी है और शिक्षा, आरक्षण, और सामाजिक सुधारों के माध्यम से समानता को बढ़ावा दिया है।

कार्यक्रम में भाग लेने से पहले राज्यपाल ने कण्डदेवी के सोरनमूर्थीस्वरर-पेरियानायगी अम्मन मंदिर में पूजा भी की, जहाँ उन्हें धार्मिक सम्मान के साथ स्वागत किया गया। यह दिखाता है कि तमिलनाडु में धर्म, संस्कृति और राज्य की भूमिकाएँ आपस में कितनी गहराई से जुड़ी हुई हैं।

अंततः, राज्यपाल की टिप्पणी एक संवेदनशील मुद्दे को उजागर करती है। लेकिन जातियों पर चर्चा करते समय ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पक्षों को भी समझना आवश्यक है। भारत जैसे विविध देश में एकता, समरसता और समानता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए संतुलित और जिम्मेदार संवाद की आवश्यकता है।

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