नई शिक्षा नीति पर हस्ताक्षर नहीं करने के कारण तमिलनाडु को शिक्षा निधि नहीं मिली – मद्रास उच्च न्यायालय में केंद्र सरकार का स्पष्टीकरण

नई शिक्षा नीति पर हस्ताक्षर नहीं करने के कारण तमिलनाडु को शिक्षा निधि नहीं मिली – मद्रास उच्च न्यायालय में केंद्र सरकार का स्पष्टीकरण

शिक्षा हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A के अनुसार, 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देना राज्य की जिम्मेदारी है। इसे लागू करने के लिए वर्ष 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (Right to Education Act – RTE) पारित किया गया। इस अधिनियम के तहत, निजी विद्यालयों को 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित करनी होती हैं। इस योजना की लागत राज्य और केंद्र सरकारें मिलकर वहन करती हैं।

हालांकि, हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय में हुई सुनवाई में यह मुद्दा सामने आया कि तमिलनाडु सरकार को केंद्र द्वारा उसकी हिस्से की निधि नहीं दी गई है।

मामला कैसे शुरू हुआ?

कोयंबतूर निवासी ईश्वरन नामक एक व्यक्ति ने मद्रास उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। उन्होंने आरोप लगाया कि तमिलनाडु सरकार शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत निजी स्कूलों में 25% सीटें वंचित बच्चों को दे रही है, लेकिन केंद्र सरकार ने इसके लिए निर्धारित फंड जारी नहीं किया

यह मामला न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और वी. लक्ष्मी नारायणन की खंडपीठ के समक्ष आया। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह यह स्पष्ट करे कि फंड क्यों रोका गया है।

केंद्र सरकार का स्पष्टीकरण

इस निर्देश के जवाब में, केंद्र सरकार ने अपना स्पष्टीकरण अदालत में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) से संबंधित समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसीलिए उन्हें शिक्षा के लिए केंद्र की ओर से कोई राशि नहीं आवंटित की गई

केंद्र के अनुसार, राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने के लिए राज्य सरकारों को सहयोग करना चाहिए। इसके लिए एक औपचारिक समझौता आवश्यक है। चूंकि तमिलनाडु सरकार ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए, इसलिए निधि रोक दी गई।

तमिलनाडु की स्थिति

तमिलनाडु सरकार NEP 2020 का शुरू से विरोध करती रही है। उनका कहना है कि यह नीति राज्य की सामाजिक न्याय प्रणाली, मातृभाषा में शिक्षा, और समान अवसरों पर आधारित शिक्षा मॉडल के खिलाफ है।

विशेष रूप से तीन-भाषा फार्मूला, राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाएं, और शिक्षा का केंद्रीकरण जैसे प्रावधानों का तमिलनाडु में विरोध हुआ है। राज्य की पारंपरिक समचर्चा शिक्षा प्रणाली (Samacheer Kalvi) NEP से मेल नहीं खाती।

अदालती कार्यवाही की स्थिति

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, अदालत ने फैसले को आरक्षित रखा, लेकिन निर्णय की कोई तारीख घोषित नहीं की। इस प्रकार, मामला अभी भी लंबित है और तमिलनाडु को निधि मिलने का कोई स्पष्ट संकेत नहीं है।

राजनीतिक दृष्टिकोण

यह मामला केवल एक कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक टकराव का भी प्रतीक है। तमिलनाडु की वर्तमान द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) सरकार ने सत्ता में आने के बाद से केंद्र की कई नीतियों का विरोध किया है। NEP भी उनमें से एक है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार राज्यों को फंड देने से पहले नीति के पालन की शर्त रख रही है, जिससे संघीय ढांचे (Federalism) पर भी प्रश्न उठ रहे हैं।

कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्र द्वारा फंड रोकना राज्य की स्वायत्तता पर आघात है। यदि फंड केवल इस आधार पर रोका जाएगा कि राज्य ने केंद्र की नीति को नहीं माना, तो यह भविष्य में कई राज्यों के लिए एक खतरनाक उदाहरण बन सकता है।

NEP बनाम तमिलनाडु की शिक्षा नीति

तमिलनाडु की शिक्षा नीति सामाजिक न्याय, आरक्षण, और मातृभाषा में शिक्षा को प्राथमिकता देती है। वहीं NEP को केन्द्रीयकरण, निजीकरण, और हिंदी और संस्कृत को बढ़ावा देने वाली नीति कहा गया है। इस कारण से राज्य को डर है कि NEP लागू करने से वंचित वर्गों और क्षेत्रीय भाषाओं को नुकसान पहुंचेगा।

छात्रों पर प्रभाव

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा असर छात्रों, खासकर गरीब बच्चों पर पड़ सकता है। यदि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत फंड नहीं दिया जाता है, तो निजी स्कूल वंचित बच्चों को दाखिला देने से हिचक सकते हैं। इससे हजारों बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है और उनका मौलिक अधिकार उनसे छिन सकता है।

यह परिस्थिति दर्शाती है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील और मौलिक विषयों में राजनीति या नीति विवादों को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए

निष्कर्ष

एक आम नागरिक द्वारा शुरू की गई याचिका अब राष्ट्रीय शिक्षा नीति, संघीय ढांचा और मौलिक अधिकारों के बीच एक व्यापक बहस बन चुकी है। क्या तमिलनाडु सरकार केंद्र के दबाव में आकर NEP पर हस्ताक्षर करेगी? या क्या केंद्र सरकार राज्यों की स्वायत्तता का सम्मान करते हुए निधि जारी करेगी?

जब तक अदालत का अंतिम निर्णय नहीं आता, तब तक इस मुद्दे पर असमंजस बना रहेगा। लेकिन यह स्पष्ट है कि शिक्षा का अधिकार छात्रों से नहीं छीना जाना चाहिए, और केंद्र-राज्य विवादों का खामियाजा बच्चों को नहीं भुगतना चाहिए।

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