कन्याकुमारी में एक पिता ने तीन मासूम बच्चों को बताया ‘शैतान का वश’, की बेरहमी से पिटाई – समाज में सनसनी

कन्याकुमारी में एक पिता ने तीन मासूम बच्चों को बताया ‘शैतान का वश’, की बेरहमी से पिटाई – समाज में सनसनी

तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जहां एक व्यक्ति ने यह दावा करते हुए कि उसके बच्चे ‘शैतान के वश में हैं’, उन्हें रस्सी से बांधकर बेरहमी से पीटा। धार्मिक अंधविश्वास की वजह से की गई यह बर्बरता अब पूरे राज्य में चिंता का विषय बन गई है।


घटना का स्थान और परिवार की जानकारी

यह घटना कन्याकुमारी जिले के देवीकोडु इलाके के मिडालम गाँव के पास स्थित ईडैक्कोट्टू नामक क्षेत्र में घटित हुई। आरोपी किंग्सली नामक व्यक्ति एक 45 वर्षीय ईसाई धर्म प्रचारक (पास्टर) हैं। उनकी पत्नी का नाम सजिनी है। इस दंपति के तीन बच्चे हैं—एक 6 वर्षीय बेटा, एक 3 वर्षीय बेटा और एक 8 महीने की बेटी।

किंग्सली अपने परिवार के साथ करुंगल के पास पेरुमांकुझी क्षेत्र में एक बहुमंजिला इमारत में किराए के घर में रह रहे थे।


घटना कैसे घटी

घटना वाले दिन, किंग्सली और उनकी पत्नी सजिनी कुछ समय के लिए घर से बाहर गए हुए थे। जब वे लौटे, तो उन्हें घर में उनके बच्चे नहीं मिले। पता चला कि बच्चे पड़ोसी के घर में जाकर वहाँ के बच्चों के साथ खेल रहे थे।

इस पर किंग्सली को बेहद गुस्सा आया। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि वह बच्चों को तुरंत घर बुलाए। जब तीनों बच्चे घर लौटे, तो किंग्सली ने उन्हें रस्सी से बांध दिया और बुरी तरह पीटा। चौंकाने वाली बात यह रही कि उनकी पत्नी सजिनी ने भी बच्चों को पीटा।

किंग्सली ने यह दावा किया कि पड़ोसियों के बच्चों के साथ खेलने के कारण उसके बच्चों में “शैतान घुस गया है”, और उसने उन्हें शारीरिक रूप से प्रताड़ित करके “शैतान भगाने” की कोशिश की।


पड़ोसियों की सतर्कता और पुलिस की कार्रवाई

बच्चों की चीखें सुनकर पड़ोसी दंग रह गए और तुरंत करुंगल पुलिस को इसकी सूचना दी। पुलिस तुरंत घटनास्थल पर पहुँची और तीनों बच्चों को बचाया।

बच्चों के शरीर पर कई चोट के निशान पाए गए। पुलिस ने किंग्सली और उनकी पत्नी को थाने लाकर पूछताछ की।

पूछताछ में किंग्सली ने बताया कि वह जब भी धर्म-प्रचार के लिए बाहर जाते हैं, तब बच्चों को घर में बंद कर चले जाते हैं। लेकिन दो दिन पहले, लौटने पर उन्होंने बच्चों को बाहर खेलते हुए पाया। तभी से उन्हें शक था कि बच्चों के शरीर में ‘शैतान प्रवेश’ कर गया है। इसलिए उन्होंने बच्चों को पीटकर ‘शुद्ध’ करने का प्रयास किया।


चिकित्सकीय उपचार और कानूनी कार्यवाही

पुलिस ने बच्चों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया और फिर उन्हें बाल कल्याण समिति के संरक्षण में एक शेल्टर होम भेज दिया गया। बच्चों की हालत अब स्थिर बताई जा रही है, लेकिन वे गहरे मानसिक आघात में हैं।

पुलिस ने किंग्सली के खिलाफ भारतीय दंड संहिता और बाल संरक्षण कानूनों के तहत मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। पत्नी सजिनी पर भी कार्रवाई की जा रही है।


धार्मिक अंधविश्वास और बाल अधिकारों की अनदेखी

यह घटना समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और उनके दुष्परिणामों को उजागर करती है। एक पिता, जिसे बच्चों का रक्षक होना चाहिए, वह खुद ही हिंसा का कारण बना। और वह भी किसी वैज्ञानिक प्रमाण के बजाय एक काल्पनिक “शैतान” के नाम पर।

यह घटना बताती है कि किस तरह धार्मिक मान्यताओं के नाम पर बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन होता है। बाल मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसी घटनाएँ बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती हैं।


समाज और प्रशासन की जिम्मेदारी

स्थानीय लोगों और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उनका कहना है कि ऐसे मामलों में केवल सज़ा ही नहीं, बल्कि समाज में जागरूकता फैलाना भी जरूरी है।

ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बाल अधिकारों, अभिभावकीय ज़िम्मेदारियों और अंधविश्वासों के खिलाफ जन-जागरूकता अभियान चलाना ज़रूरी है।


कानून का दायरा और बाल संरक्षण की भूमिका

बाल यौन शोषण से संरक्षण अधिनियम (POCSO) और किशोर न्याय अधिनियम के तहत ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन कई बार ये तभी प्रभावी होते हैं जब समाज सतर्क हो और समय पर पुलिस को सूचना दे।

इस केस में पड़ोसियों की तत्परता के कारण बच्चे समय पर बचाए जा सके। इससे यह स्पष्ट होता है कि समाज की भागीदारी बाल सुरक्षा में अहम है।


बच्चों के लिए मानसिक परामर्श की जरूरत

चिकित्सकीय इलाज के साथ-साथ बच्चों को मनोवैज्ञानिक परामर्श की भी आवश्यकता है। अपने माता-पिता द्वारा प्रताड़ित होने की पीड़ा बच्चों के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। ऐसे बच्चों के पुनर्वास के लिए राज्य सरकार और सामाजिक संगठनों को एकजुट होकर काम करना होगा।


निष्कर्ष

यह घटना केवल एक घरेलू हिंसा का मामला नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरता और बाल संरक्षण तंत्र की कमजोरियों का आईना है।

हर बच्चे को प्रेम, सुरक्षा और सम्मान पाने का अधिकार है। जब ये अधिकार उनके अपने ही अभिभावकों द्वारा छीने जाते हैं, तब कानून को सख्ती से कदम उठाना चाहिए।

यह मामला समाज के लिए एक चेतावनी है – अब वक्त है कि हम अंधविश्वास के खिलाफ आवाज़ उठाएं और अपने बच्चों को एक सुरक्षित, प्रेमपूर्ण और विवेकपूर्ण माहौल दें।

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