भारतीय सेना में धर्मनिरपेक्षता और अनुशासन: लेफ्टिनेंट सैमुएल कमलेसन का मामला

भारतीय सेना में धर्मनिरपेक्षता और अनुशासन: लेफ्टिनेंट सैमुएल कमलेसन का मामला

भारतीय सेना देश की सबसे अनुशासित और धर्मनिरपेक्ष संस्थाओं में से एक मानी जाती है। यह एक ऐसा संगठन है जहाँ विभिन्न धर्मों, जातियों और भाषाओं के लोग एकजुट होकर राष्ट्र की सेवा करते हैं। “एक वर्दी, एक झंडा, एक भारत” की भावना को आत्मसात करते हुए सेना सभी सैनिकों को समान रूप से देखती है। हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें एक अधिकारी – लेफ्टिनेंट सैमुएल कमलेसन – की सेवा समाप्ति को सही ठहराया गया। इसने सेना में अनुशासन और धर्मनिरपेक्षता के महत्व को फिर से रेखांकित किया है।


मामले की पृष्ठभूमि

लेफ्टिनेंट सैमुएल कमलेसन वर्ष 2017 में भारतीय सेना में शामिल हुए थे। उन्हें एक सिख रेजिमेंट में अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया। इस रेजिमेंट के कैंपस में एक गुरुद्वारा और एक हिंदू मंदिर मौजूद था। इन स्थलों पर समय-समय पर धार्मिक आयोजन होते थे, जिनमें सैनिक भाग लेते हैं – यह सैनिकों के बीच एकता, परंपरा और भाईचारे को मजबूत करने का एक हिस्सा होता है।

लेकिन लेफ्टिनेंट कमलेसन ने इन आयोजनों में भाग लेने से इंकार कर दिया। उन्होंने यह कहते हुए आपत्ति जताई कि वे ईसाई धर्म से संबंधित हैं, और उनके धर्मस्थल – चर्च – की कैंप में कोई व्यवस्था नहीं है। उन्होंने मांग की कि या तो सभी धर्मों के लिए ‘सर्व धर्म स्थल’ बनाया जाए या उन्हें इन आयोजनों में भाग लेने से छूट दी जाए।

सेना ने उन्हें कई बार काउंसलिंग दी, समझाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने किसी भी धार्मिक आयोजन में भाग लेने से स्पष्ट रूप से इंकार किया। अंततः, सेना ने इसे अनुशासनहीनता माना और उन्हें सेवा से हटा दिया।


न्यायालय का फैसला

लेफ्टिनेंट कमलेसन ने अपनी सेवा समाप्ति को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी। 30 अप्रैल 2025 को न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की पीठ ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा:

“भारतीय सेना में विभिन्न धर्मों और जातियों के लोग हैं, लेकिन वे वर्दी के माध्यम से एकजुट होते हैं। सेना में धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान होता है, लेकिन किसी भी सैनिक को अपनी धार्मिक आस्था को अनुशासन और आदेशों से ऊपर रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

अदालत ने यह भी कहा कि सिख रेजिमेंट, राजपूत रेजिमेंट, जाट रेजिमेंट जैसी इकाइयाँ परंपराओं के आधार पर गठित हैं, न कि धार्मिक प्रतिबद्धताओं के आधार पर। इन रेजिमेंटों में सेवा करने वाले अधिकारियों से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे उस धर्म को मानें, बल्कि उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे रेजिमेंट की परंपराओं और आयोजनों का सम्मान करें।


सेना में धर्मनिरपेक्षता का महत्व

भारतीय संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। लेकिन यह स्वतंत्रता पूर्ण और असीमित नहीं है – खासकर जब व्यक्ति सेना जैसी संस्था का हिस्सा हो। सेना का कार्य अनुशासन, एकता और आदेशों के पालन पर आधारित होता है। व्यक्तिगत धार्मिक आस्थाओं को सार्वजनिक अनुशासन और सेवा-हित से नीचे माना जाता है।

सेना में हर सैनिक को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता होती है, लेकिन जब निजी आस्था, आदेशों और रेजिमेंटीय एकता में बाधा बनती है, तो वह अस्वीकार्य हो जाती है। लेफ्टिनेंट कमलेसन का रुख यह स्पष्ट करता है कि वे अपने आदेशों का पालन करने के बजाय निजी धार्मिक भावनाओं को अधिक महत्व दे रहे थे।


रेजिमेंटीय परंपराएं और सैनिकों की एकता

सेना की रेजिमेंटें केवल लड़ाकू इकाइयाँ नहीं होतीं, वे एक परिवार की तरह होती हैं। रेजिमेंट की परंपराएं, चाहे वे धार्मिक हों, सांस्कृतिक हों या सामाजिक, सभी सैनिकों को जोड़ने का कार्य करती हैं। इन आयोजनों में भागीदारी केवल पूजा के लिए नहीं होती, बल्कि एकता, भाईचारे और सम्मान का प्रदर्शन होती है।

यह आवश्यक नहीं होता कि कोई अधिकारी किसी विशेष धर्म की पूजा में विश्वास करे – बल्कि वह वहां उपस्थित होकर, सहयोग करके और सम्मान देकर अपनी एकता दिखाता है। लेफ्टिनेंट कमलेसन की ओर से इन आयोजनों से अलग-थलग रहना रेजिमेंटीय एकता के लिए हानिकारक था।


अधिकारियों की भूमिका और नेतृत्व

सेना के अधिकारी केवल आदेश देने वाले नहीं होते – वे आदर्श होते हैं। उनका आचरण नीचे के सैनिकों के लिए मार्गदर्शक होता है। यदि एक अधिकारी अपने निजी विश्वासों को सेवा के आदेशों से ऊपर रखता है, तो यह पूरी इकाई में अनुशासनहीनता का कारण बन सकता है।

अदालत ने इसे रेखांकित करते हुए कहा कि लेफ्टिनेंट कमलेसन ने अपनी आस्था को अपने सैन्य कर्तव्यों से ऊपर रखा, जो कि अस्वीकार्य है। उनके इस रवैये से न केवल आदेशों की अवहेलना हुई, बल्कि रेजिमेंट में असंतुलन भी उत्पन्न हुआ।


सेना में स्वतंत्रता बनाम ज़िम्मेदारी

इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश जाता है कि सेना में सेवा करते समय धार्मिक स्वतंत्रता को सेवा की ज़िम्मेदारियों के तहत निभाना पड़ता है। व्यक्तिगत आस्थाएं तब तक स्वीकार्य हैं जब तक वे सेवा अनुशासन में बाधा न बनें।

लेफ्टिनेंट कमलेसन को ईसाई धर्म मानने का अधिकार था, लेकिन जब उन्होंने बार-बार आदेशों को नकारा और आयोजनों में भाग न लेने की जिद की, तो यह सेवा अनुशासन का उल्लंघन बन गया।


न्यायिक निष्कर्ष और व्यापक संदेश

दिल्ली उच्च न्यायालय का यह फैसला एक मिसाल है – यह स्पष्ट करता है कि भारतीय सेना में अनुशासन सर्वोपरि है। धर्म, जाति, या क्षेत्र के नाम पर कोई भी व्यक्ति अनुशासनहीनता नहीं कर सकता। सेना एक धर्मनिरपेक्ष संस्था है, और यह अनुशासन के बल पर ही मजबूत बनी हुई है।


निष्कर्ष

लेफ्टिनेंट सैमुएल कमलेसन का मामला केवल एक धार्मिक विवाद नहीं है – यह सेना के मूलभूत सिद्धांतों: अनुशासन, धर्मनिरपेक्षता और एकता की परीक्षा है। भारतीय सेना सभी धर्मों का सम्मान करती है, लेकिन यह अपेक्षा करती है कि हर सैनिक देश और ड्यूटी को सर्वोच्च माने।

इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि वर्दी पहनना केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है – जो निजी आस्था से ऊपर होती है। राष्ट्र, वर्दी और अनुशासन सबसे पहले आते हैं।

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