मातृभाषा का महत्व – मोहन भागवत के भाषण पर आधारित

मातृभाषा का महत्व – मोहन भागवत के भाषण पर आधारित

मातृभाषा केवल एक संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हमारी पहचान, संस्कृति, परंपरा और भावनाओं की अभिव्यक्ति का मूल आधार है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने कोयंबटूर के पेरूर में आयोजित 24वें पेरूर आधीनम के शताब्दी समारोह में भाषण देते हुए मातृभाषा के महत्व को जोरदार तरीके से रेखांकित किया।

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि आज का विश्व धर्म के मार्ग से भटक गया है और इसे याद दिलाना हम सबका कर्तव्य है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हमें अपनी संस्कृति और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सच्ची खुशी मन से आती है, और यदि हम प्रकृति का विनाश करेंगे, तो प्रकृति भी हमें नष्ट कर देगी।

भागवत ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई कि आज परिवार टूटते जा रहे हैं और इसके कारण हमारी सांस्कृतिक जड़ें भी कमजोर हो रही हैं। मातृभाषा हमारे परिवार और संस्कृति को जोड़ने वाला एक मजबूत माध्यम है। जब बच्चे अपनी मातृभाषा में संवाद नहीं करते या उसे अपनाने में संकोच करते हैं, तो यह केवल भाषा की हानि नहीं होती, बल्कि एक पूरी सभ्यता की विरासत खो जाती है।

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि “भाषा की हानि, संस्कृति की हानि है।” वास्तव में, प्रत्येक भाषा एक विशेष दृष्टिकोण, दर्शन, साहित्य, इतिहास और आध्यात्मिक ज्ञान को अपने भीतर समेटे रहती है। भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती, यह एक पूरी जीवनशैली का प्रतिनिधित्व करती है। जब कोई भाषा समाप्त होती है, तो उसके साथ सोचने, समझने और महसूस करने का एक अनोखा तरीका भी चला जाता है।

आज के समय में वैश्वीकरण और आधुनिक शिक्षा प्रणाली के कारण अंग्रेज़ी जैसी भाषाओं का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया है, जिससे मातृभाषाओं का प्रयोग सीमित होता जा रहा है। विद्यालयों में, घरों में और मीडिया में मातृभाषा को वह स्थान नहीं मिल रहा जो उसे मिलना चाहिए। इसे बदलना आवश्यक है।

यदि हम अपने बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा दें, तो वे बेहतर समझ सकेंगे, और उनके अंदर आत्मविश्वास और सांस्कृतिक गर्व की भावना विकसित होगी। मातृभाषा में सोचने, सीखने और अभिव्यक्ति करने की क्षमता बच्चे को जीवन में मजबूत बनाती है।

अंततः, मोहन भागवत का यह संदेश हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि मातृभाषा को अपनाना केवल एक भाषिक आंदोलन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का साधन है। यदि हम सभी अपनी-अपनी भाषाओं को सम्मान और स्थान देंगे, तभी हम अपने समाज और देश की आत्मा को जीवित रख सकेंगे।

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