मुख्यमंत्री स्टालिन की सरकार कट्टुनायकन समुदाय को धोखा क्यों दे रही है? मुथुकृष्णन की आत्महत्या से उठे सवाल

मुख्यमंत्री स्टालिन की सरकार कट्टुनायकन समुदाय को धोखा क्यों दे रही है? मुथुकृष्णन की आत्महत्या से उठे सवाल

तमिलनाडु के तूतीकोरिन ज़िले के तिरुचेंदूर के पास स्थित परमनकुरिची-समत्वपुरम गांव से आई एक दर्दनाक खबर ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया है। कट्टुनायकन जनजाति से ताल्लुक रखने वाले मुथुकुमार और थिरुमणि के बेटे, मुथुकृष्णन नामक छात्र ने आत्महत्या कर ली। उसके परिवार का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन द्वारा जाति प्रमाण पत्र के लिए दबाव बनाया जा रहा था, जिससे मानसिक तनाव में आकर उसने यह कठोर कदम उठाया।

यह छात्र परमनकुरिची में स्थित सीएसआई सरकारी सहायता प्राप्त हाई स्कूल में दसवीं कक्षा में पढ़ रहा था। वह अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणी के कट्टुनायकन समुदाय से था। स्कूल प्रशासन उस पर बार-बार जाति प्रमाण पत्र जमा करने का दबाव बना रहा था। हालांकि, छात्र के परिवार ने पहले ही प्रमाण पत्र के लिए आवश्यक प्रक्रियाएं शुरू कर दी थीं, लेकिन सरकारी प्रशासन की ढिलाई और उदासीनता ने उनके प्रयासों को विफल कर दिया।

जाति प्रमाण पत्र – एक समुदाय के लिए जीवन और मौत का सवाल

भारत में जाति प्रमाण पत्र सिर्फ एक दस्तावेज़ नहीं है – यह शिक्षा, छात्रवृत्तियों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का आधार होता है। अनुसूचित जनजातियों के लिए, यह प्रमाण पत्र जीवन की आधारशिला जैसा होता है।

लेकिन कट्टुनायकन समुदाय के लोगों को यह प्रमाण पत्र प्राप्त करने में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अदालतों के निर्देश और कई वर्षों के संघर्ष के बावजूद, प्रशासनिक पेचिदगियों और पुराने दस्तावेजों की मांग के चलते इन लोगों को प्रमाण पत्र नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप, ऐसे छात्र बोर्ड परीक्षाओं (जैसे 10वीं, 12वीं) में शामिल भी नहीं हो पाते।

क्या सरकार नैतिक रूप से जिम्मेदार है?

मुथुकृष्णन की आत्महत्या के बाद, पुलिस ने पुष्टि की कि उसने एक सुसाइड नोट छोड़ा था, जिसमें उसने स्कूल की चार शिक्षिकाओं – ब्युला, मैरी, मुख्याध्यापिका सत्य और वालरमथी – को जिम्मेदार ठहराया था। उनके अनुसार, इन लोगों ने जाति प्रमाण पत्र को लेकर बार-बार मानसिक उत्पीड़न किया।

इसके जवाब में स्कूल प्रशासन ने इन चारों को निलंबित कर दिया। लेकिन क्या इतना ही पर्याप्त है? तमिलनाडु बीजेपी के राज्य अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन ने सरकार से तीखा सवाल पूछा:

“जो सरकार खुद को ‘सामाजिक न्याय’ की सरकार कहती है, वह कट्टुनायकन समुदाय के साथ धोखा क्यों कर रही है?”

उनका कहना है कि केवल शिक्षकों को निलंबित कर देना न्याय नहीं है। यदि प्रमाण पत्र के अभाव में दबाव के कारण कोई बच्चा आत्महत्या करता है, तो सरकार को भी नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

नागेंद्रन के सवाल – राजनीति नहीं, सच्चाई की पुकार

नैनार नागेंद्रन के सवाल केवल राजनीति तक सीमित नहीं हैं – वे जमीनी सच्चाई को उजागर करते हैं। वह पूछते हैं:

  • कट्टुनायकन जैसे जनजातीय समुदाय आज भी जाति प्रमाण पत्र के लिए संघर्ष क्यों कर रहे हैं?
  • जब सरकार खुद को सामाजिक न्याय की मसीहा कहती है, तो वह इस समस्या को हल क्यों नहीं कर पा रही?
  • क्या एक छात्र को केवल एक दस्तावेज़ के लिए अपनी जान देनी चाहिए?

ये सवाल केवल विपक्ष के नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों के हैं, जो इस व्यवस्था से हर दिन लड़ रहे हैं।

क्या ‘सामाजिक न्याय’ सिर्फ एक नारा है?

2021 में सत्ता में आने के बाद, मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने अपनी सरकार को “सामाजिक न्याय सरकार” बताया था। उन्होंने सामाजिक समानता, जाति-विरोध और वंचितों को अधिकार दिलाने के वादे किए थे।

लेकिन मुथुकृष्णन की मौत इस बात का सबूत है कि वादों को ज़मीन पर उतारने में सरकार विफल रही है। केवल नारे लगाने से बदलाव नहीं आता। अगर एक आदिवासी छात्र को अपनी पहचान साबित करने के लिए मरना पड़े, तो यह सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि सामाजिक क्रूरता है।

प्रशासनिक विफलता या संस्थागत जातिवाद?

जाति प्रमाण पत्र देने में देरी किसी नियम की कमी से नहीं है। न्यायालयों ने प्रक्रिया को आसान बनाने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं। इसके बावजूद, जिला अधिकारी अक्सर पुराने ज़मीनी दस्तावेज़, वंशावली, या परंपराओं के सबूत मांगते हैं – जो अधिकतर परिवारों के पास नहीं होते।

अनेक बार यह प्रक्रिया केवल अक्षमता के कारण नहीं, बल्कि गहरी जमी जातिवादी सोच के कारण होती है। यह सरकारी तंत्र खुद वंचितों की तरक्की में बाधा बन जाता है।

अब क्या करना चाहिए?

मुथुकृष्णन की मृत्यु को केवल एक आंकड़ा बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह राज्य के लिए एक चेतावनी है। सरकार को तुरंत निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:

  1. जाति प्रमाण पत्र की प्रक्रिया आसान बनानी चाहिए, विशेषकर अनुसूचित जनजातियों के लिए।
  2. प्रशासनिक जवाबदेही तय की जाए – जो अधिकारी या शिक्षक जातिवादी व्यवहार करते हैं, उन्हें कानूनी सज़ा मिलनी चाहिए।
  3. हर स्कूल में परामर्शदाता और हेल्पलाइन होनी चाहिए, ताकि छात्र मदद ले सकें।
  4. एसटी समुदायों के लिए विशेष कार्यबल (Task Force) गठित हो, जो जाति पहचान की समस्याओं को हल कर सके।
  5. सरकार को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए और मुथुकृष्णन के परिवार को मुआवज़ा व समर्थन देना चाहिए।

एक छात्र की मौत – समाज का आईना

मुथुकृष्णन इसलिए नहीं मरा कि वह कमजोर था, बल्कि इसलिए कि पूरी व्यवस्था ने उसे तोड़ दिया। उसका अंतिम पत्र केवल एक आरोप नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जो एक बच्चे को आत्महत्या करने पर मजबूर करती है।

यदि स्टालिन सरकार वास्तव में सामाजिक न्याय में विश्वास करती है, तो उसे इस घटना से सीख लेनी चाहिए और ठोस कदम उठाने चाहिए – वरना “सामाजिक न्याय” सिर्फ एक राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा।

निष्कर्ष

मुथुकृष्णन की आत्महत्या केवल एक छात्र की नहीं, बल्कि हजारों आदिवासी बच्चों की कहानी है जिन्हें पहचान, शिक्षा और उम्मीद से वंचित कर दिया गया है। तमिलनाडु सरकार को यह समझना चाहिए कि “न्याय में देरी, अन्याय है”, और इस मामले में देरी ने एक जीवन छीन लिया।

अब समय आ गया है कि सभी राजनीतिक दल, सरकारी संस्थाएं और समाज मिलकर ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति न होने देने के लिए कार्य करें। मुथुकृष्णन की मृत्यु व्यर्थ नहीं जानी चाहिए – यह एक क्रांति की शुरुआत बने।

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