प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अंतरिक्ष अनुसंधान पर आयोजित एक वैश्विक सम्मेलन में वीडियो के माध्यम से संबोधित करते हुए कहा, “अंतरिक्ष में छोड़े जाने वाले रॉकेट केवल पेलोड (भार) नहीं ले जाते, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के सपनों को भी अपने साथ ले जाते हैं।” यह बयान न केवल भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों को दर्शाता है, बल्कि देशवासियों की उम्मीदों, आत्मविश्वास और आकांक्षाओं को भी उजागर करता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कहा कि भारत के लिए अंतरिक्ष केवल एक लक्ष्य नहीं, बल्कि उत्साह, साहस और सामूहिक प्रगति का प्रतीक है। उन्होंने 1963 में एक छोटे रॉकेट से शुरुआत कर, आज चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव तक पहुँचने की यात्रा को “उल्लेखनीय” बताया। यह सफर भारतीय वैज्ञानिकों की लगन, परिश्रम और देशभक्ति का प्रतिफल है।
आज अंतरिक्ष तकनीक हमारे जीवन के हर क्षेत्र से जुड़ी हुई है — जैसे कि संचार, मौसम पूर्वानुमान, कृषि, सुरक्षा और डिजास्टर मैनेजमेंट। इसीलिए प्रधानमंत्री का यह कहना बिल्कुल उचित है कि रॉकेट के साथ देश के करोड़ों लोगों की भावनाएँ, उम्मीदें और प्रेरणाएँ भी अंतरिक्ष की ऊँचाइयों तक जाती हैं।
भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो (ISRO) और अब उभरते हुए निजी अंतरिक्ष स्टार्टअप्स मिलकर देश को अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना रहे हैं। चंद्रयान, मंगलयान और अब गगनयान जैसी परियोजनाएँ भारत को वैश्विक मंच पर अग्रणी बना रही हैं।
प्रधानमंत्री मोदी का यह संदेश केवल वैज्ञानिकों के लिए नहीं, बल्कि हर उस युवा के लिए है जो बड़ा सपना देखता है। यह प्रेरणा देता है कि भारत अब तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि नवाचार (innovation) का निर्माता है।
अंत में, यह वक्तव्य न केवल एक राजनीतिक भाषण था, बल्कि आशा और आत्मविश्वास से भरा एक राष्ट्रीय आव्हान था। हर भारतीय के मन में जो “आसमान छूने की चाह” है, वह अब हकीकत में बदल रही है — और भारत का हर रॉकेट उस सपने का वाहक बन रहा है।