युद्ध अज्ञानी लोगों द्वारा थोपा जाता है” – पूर्व सेना प्रमुख मनोज नरवणे
युद्ध किसी भी देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने का अंतिम विकल्प होता है, न कि पहला। लेकिन आज के समय में भावनात्मक प्रतिक्रियाएं, राजनीतिक दबाव और गलत सूचनाएं लोगों को युद्ध की ओर धकेल देती हैं। पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने हाल ही में पुणे में आयोजित एक कार्यक्रम में इसी विषय पर अपनी चिंता व्यक्त की।
भारत-पाकिस्तान युद्धविराम समझौते को लेकर उठ रहे सवालों के जवाब में उन्होंने कहा कि जब विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने युद्धविराम की घोषणा की, तब कुछ लोगों ने उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां कीं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “युद्ध अज्ञानी लोगों द्वारा थोपा जाता है।”
उन्होंने कहा कि युद्ध कोई बॉलीवुड फिल्म नहीं है, जिसमें वीरता और रोमांच होता है। असल में युद्ध का मतलब है – मृत्यु, विनाश और परिवारों का बिखराव। सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले आम लोग सबसे अधिक पीड़ित होते हैं। बच्चे अपने पिता को खो देते हैं, महिलाएं अपने पतियों को, और कई लोग अपने घर, ज़मीन और भविष्य – सब कुछ खो बैठते हैं।
नरवणे ने यह भी कहा कि युद्ध शुरू करना आसान लगता है, लेकिन उसे झेलना बेहद कठिन होता है। सोशल मीडिया के दौर में भावनात्मक भाषण, ग़लत जानकारियाँ और अतिराष्ट्रवादी नारेबाज़ी लोगों को उकसाती है, लेकिन ये सब बिना जानकारी के, केवल उत्तेजना पर आधारित होती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि असली देशभक्ति युद्ध की मांग करने में नहीं, शांति और समाधान खोजने में है। युद्ध से देश की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ता है, समाज में अस्थिरता आती है और पीढ़ियों तक उसका असर रहता है। यहां तक कि जीतने वाला देश भी गहरे ज़ख्मों से गुजरता है।
मनोज नरवणे की बात एक कड़वा लेकिन ज़रूरी सच है – कि बिना सोचे-समझे युद्ध की मांग करना राष्ट्र के लिए खतरनाक हो सकता है। हमें यह समझने की ज़रूरत है कि बुद्धिमान नागरिक वही होते हैं जो भावनाओं के बजाय तर्क और समझदारी से सोचते हैं।
निष्कर्षतः, यह कहना ग़लत नहीं होगा कि “युद्ध अज्ञानी लोगों द्वारा थोपा जाता है”, लेकिन उसका खामियाज़ा सैनिकों और आम नागरिकों को भुगतना पड़ता है। इसलिए शांति की दिशा में सोचें, समझदारी से निर्णय लें, और देशहित में ऐसे विचारों को बढ़ावा दें जो युद्ध नहीं, बल्कि समृद्धि और स्थिरता लाएं।