PSLV-C61 रॉकेट की विफलता – एक विश्लेषण
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) विश्व स्तर पर एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्था के रूप में जाना जाता है, जिसने सीमित संसाधनों में अनेक सफल अंतरिक्ष मिशन पूरे किए हैं। लेकिन हाल ही में हुए PSLV-C61 मिशन की विफलता ने एक असामान्य झटका दिया है, जो वैज्ञानिक समुदाय और आम जनता के लिए चिंताजनक रहा।
PSLV-C61 रॉकेट को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से पृथ्वी अवलोकन उपग्रह के साथ प्रक्षेपित किया गया था। रॉकेट की पहली और दूसरी चरणों की विभाजन प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हुई, लेकिन तीसरे चरण में तकनीकी खराबी के कारण वह पृथ्वी की कक्षा में उपग्रह को स्थापित करने में असमर्थ रहा।
इसरो के अध्यक्ष श्री नारणायणन ने इस बारे में जानकारी देते हुए कहा कि, “रॉकेट के तीसरे चरण में तकनीकी गड़बड़ी के कारण वह समय पर अलग नहीं हो सका। इसी वजह से मिशन विफल रहा।” उन्होंने यह भी बताया कि इस विषय पर विस्तृत तकनीकी विश्लेषण के बाद एक आधिकारिक रिपोर्ट जारी की जाएगी।
हालांकि यह घटना एक दुर्भाग्यपूर्ण असफलता है, लेकिन अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में ऐसे उतार-चढ़ाव आम बात हैं। हर असफलता से नई सीख मिलती है जो भविष्य के मिशनों की सफलता के लिए एक मजबूत नींव तैयार करती है। ISRO ने पूर्व में भी ऐसे कई झटकों से उभर कर बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की हैं — जैसे चंद्रयान-3, आदित्य-एल1, और मंगलयान जैसे ऐतिहासिक मिशन।
PSLV रॉकेट भारत का सबसे भरोसेमंद प्रक्षेपण यान रहा है, जिसकी सफलता दर बहुत उच्च रही है। C61 की यह असफलता यह याद दिलाती है कि तकनीकी निगरानी और नवाचार हमेशा ज़रूरी हैं, चाहे प्रणाली कितनी भी परिपक्व क्यों न हो।
अब ISRO की तकनीकी टीम इस असफलता के कारणों की गहनता से जांच कर रही है। भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे और नई तकनीकों को शामिल किया जाएगा।
संक्षेप में कहा जाए तो PSLV-C61 की असफलता भले ही एक निराशाजनक खबर हो, लेकिन यह ISRO की दृढ़ता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए एक और चुनौती है। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम हर असफलता के बाद और भी मज़बूती से उभरता है, और इसमें कोई संदेह नहीं कि ISRO आने वाले समय में फिर एक नया इतिहास रचेगा।