बाढ़ और भूस्खलन: पूर्वोत्तर भारत में मानवता पर संकट
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में लगातार हो रही भारी बारिश ने विनाशकारी स्थिति उत्पन्न कर दी है। अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, त्रिपुरा और मिज़ोरम जैसे राज्य बाढ़ और भूस्खलन की गंभीर चपेट में हैं। कई क्षेत्रों में पानी भर गया है और कई सड़कें व गांव संपर्क से कट चुके हैं।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, आने वाले दिनों में और भी अधिक बारिश की संभावना है। कुछ क्षेत्रों के लिए लाल चेतावनी (Red Alert) जारी की गई है। लोगों से सुरक्षित स्थानों की ओर स्थानांतरित होने की अपील की गई है।
अब तक की जानकारी के अनुसार, 19 लोगों की जान जा चुकी है और लगभग 12,000 लोग प्रभावित हुए हैं। ऐसा संदेह है कि 20 से अधिक लोग अब भी बाढ़ में फंसे हो सकते हैं या लापता हैं। यह स्थिति लगातार और अधिक चिंताजनक होती जा रही है।
इस प्राकृतिक आपदा ने बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुँचाया है। कई सड़कें बह गई हैं, पुल टूट चुके हैं, और सैकड़ों घर पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए हैं। कई स्थानों पर बिजली और संचार सेवाएँ बाधित हो चुकी हैं। राहत और बचाव कार्य तेजी से चल रहे हैं, लेकिन लगातार बारिश और टूटे हुए रास्तों के कारण राहत टीमों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF), राज्य आपदा मोचन दल (SDRF) और स्थानीय प्रशासन संयुक्त रूप से कार्य कर रहे हैं। प्रभावित क्षेत्रों में फंसे लोगों को निकाला जा रहा है और उन्हें भोजन, पानी, और प्राथमिक चिकित्सा जैसी ज़रूरी सहायता दी जा रही है। लेकिन कुछ दूरदराज़ के इलाकों तक पहुँचना बहुत कठिन हो गया है।
भूस्खलन की घटनाएँ भी तेजी से बढ़ी हैं। गीली मिट्टी और कमजोर ढलानों के कारण कई स्थानों पर भारी भूस्खलन हुआ है जिससे कई सड़कें बंद हो गई हैं और जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है।
यह आपदा एक गंभीर संकेत है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की चरम स्थितियाँ अब अधिक बार और तीव्रता से सामने आ रही हैं। इस संकट से यह स्पष्ट होता है कि हमें प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अधिक सतर्क, तैयार और संगठित होना होगा।
हमें ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए पहले से योजनाबद्ध ढांचे, मजबूत बुनियादी संरचनाएं, समय पर चेतावनी तंत्र, और सामुदायिक जागरूकता बढ़ाने की ज़रूरत है।
निष्कर्ष
पूर्वोत्तर भारत में आई बाढ़ और भूस्खलन की यह आपदा केवल एक क्षेत्रीय त्रासदी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय है। इससे सबक लेते हुए हमें प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने और आने वाले खतरों से निपटने की बेहतर तैयारी करनी चाहिए।