कोलकाता के इस्कॉन मंदिर के जगन्नाथ रथ पर सुखोई लड़ाकू विमान सवार।

कोलकाता इस्कॉन मंदिर में सुकोई लड़ाकू विमान के पहियों के साथ भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा – एक अनोखी पहल
भारत में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा एक अत्यंत श्रद्धापूर्ण और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध उत्सव है, जो विशेष रूप से पुरी और देशभर के इस्कॉन मंदिरों में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस वर्ष कोलकाता स्थित इस्कॉन मंदिर में होने वाली रथयात्रा एक खास तकनीकी नवाचार के कारण चर्चा में है। 27 मई को निकलने वाली इस रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ का रथ रूस के सुकोई लड़ाकू विमान के पहियों पर चलेगा।

पिछले 48 वर्षों से इस रथ में अमेरिकी बोइंग B-747 विमान के पहिये इस्तेमाल हो रहे थे। ये पहिए मजबूत और टिकाऊ होते हैं, जो भारी लकड़ी के रथ को खींचने के लिए उपयुक्त हैं। लेकिन पिछले 15 वर्षों से इस्कॉन प्रबंधन इन पहियों को बदलने की योजना बना रहा था।

इस्कॉन के प्रवक्ता राधारमण दास ने बताया –

“पिछले वर्ष की रथयात्रा के दौरान कुछ तकनीकी समस्याएँ सामने आईं। साथ ही बोइंग विमान के पहियों की उपलब्धता में भी कठिनाई आने लगी। इसके बाद हमने विकल्पों की तलाश शुरू की। तकनीकी मूल्यांकन के बाद पता चला कि रूसी सुकोई लड़ाकू विमान के पहिए हमारे रथ के लिए उपयुक्त होंगे। इसलिए हमने उन्हें लगाने का निर्णय लिया।”

सुकोई विमान के पहिए सामान्यत: 280 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से घूम सकते हैं, जब विमान उड़ान भरता है। वहीं रथयात्रा के दौरान रथ की गति केवल 1.4 किलोमीटर प्रति घंटे होती है। इस अंतर के बावजूद, इन पहियों की मजबूती और झटकों को सहने की क्षमता इस परंपरागत रथ के लिए एकदम उपयुक्त है।

इन पहियों को रथ में लगाने का काम अब अंतिम चरण में है और अगले दो सप्ताह में इसे पूरा कर लिया जाएगा। इसके बाद भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियों को रथ पर विराजमान कर नगर भ्रमण कराया जाएगा।

यह अनूठा प्रयोग आधुनिक विज्ञान और प्राचीन श्रद्धा का अद्भुत संगम है। यह दिखाता है कि धार्मिक परंपराएं भी समय के साथ तकनीकी विकास को अपना सकती हैं, जब उद्देश्य श्रद्धा और सुरक्षा दोनों हो।

इस्कॉन संस्था हमेशा अपनी रचनात्मक सोच और आधुनिक तकनीकों के उपयोग के लिए जानी जाती है। सुकोई विमान के पहियों का रथ में इस्तेमाल इसी नवाचार का उदाहरण है।

निष्कर्षतः, कोलकाता में इस वर्ष की रथयात्रा न केवल भक्तिभाव की प्रतीक होगी, बल्कि यह एक इंजीनियरिंग का चमत्कार भी होगी। यह पहल आने वाले वर्षों में अन्य धार्मिक आयोजनों में भी तकनीकी नवाचार के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकती है।

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