सनातन धर्म पर टिप्पणी के मामले में मंत्री उदयनिधि स्टालिन बेंगलुरु की विशेष अदालत में पेश — एक लाख के मुचलके पर मिली जमानत
तमिलनाडु सरकार में खेल और युवा कल्याण मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने 26 जून, 2025 को बेंगलुरु स्थित जनप्रतिनिधियों के लिए विशेष अदालत में पेश होकर एक आपराधिक मामले में ₹1 लाख के मुचलके पर जमानत प्राप्त की। यह मामला उनके सनातन धर्म पर दिए गए विवादित बयान से जुड़ा है, जिसने पिछले वर्ष देश भर में भारी विवाद खड़ा कर दिया था।
क्या था विवाद?
2 सितंबर 2024 को चेन्नई में आयोजित “सनातन उन्मूलन सम्मेलन” में बोलते हुए उदयनिधि ने कहा था:
“सनातन धर्म को डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों की तरह खत्म करना चाहिए।”
उनके इस बयान को हिंदू धर्म और आस्थाओं पर सीधा हमला माना गया, जिसे लेकर देशभर के धार्मिक संगठनों और भाजपा सहित कई राजनीतिक दलों ने तीव्र विरोध दर्ज कराया। इसके बाद, विभिन्न राज्यों में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गईं और कानूनी कार्यवाही शुरू हुई।
कई राज्यों में मुकदमे, बेंगलुरु में मामला दर्ज
बेंगलुरु निवासी सामाजिक कार्यकर्ता परमेश ने उदयनिधि और तीन अन्य—वेदांत, आधवन और मधुकुर रामलिंगम के खिलाफ एक आपराधिक याचिका जनप्रतिनिधियों की विशेष अदालत में दायर की। याचिका में कहा गया कि चेन्नई सम्मेलन और उसमें दिए गए बयान धार्मिक विद्वेष फैलाने वाले हैं और इससे सांप्रदायिक सौहार्द्र को नुकसान पहुंचा है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि ये बयान भारतीय संविधान की भावना और धार्मिक सहिष्णुता के खिलाफ हैं, और इसलिए इसके लिए आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए।
अदालत द्वारा समन, हाईकोर्ट से अंतरिम राहत
इस मामले की सुनवाई करते हुए विशेष न्यायालय ने फरवरी 2025 में चारों प्रतिवादियों को समन जारी करते हुए 3 जून 2025 को अदालत में पेश होने का आदेश दिया।
इस आदेश के बाद, उदयनिधि स्टालिन और अन्य तीनों ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर आपराधिक कार्रवाई पर रोक की मांग की। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति कृष्णा दीक्षित ने अंतरिम रोक (Stay) का आदेश दिया, जिससे कुछ समय के लिए कानूनी कार्रवाई रुकी रही।
26 जून को अदालत में पेशी और ज़मानत
इसके बावजूद, 26 जून को उदयनिधि स्टालिन बेंगलुरु की विशेष अदालत में न्यायाधीश शिवकुमार के समक्ष पेश हुए। उनके साथ वरिष्ठ अधिवक्ता बालाजी सिंह, विल्सन और धर्मपाल अदालत में उपस्थित थे। सह-आरोपी मनुधरन की ओर से अलग वकील ने पैरवी की।
उदयनिधि की ओर से दो प्रमुख याचिकाएँ दायर की गईं:
- उन्हें व्यक्तिगत रूप से हर सुनवाई में पेश होने से स्थायी छूट (permanent exemption) दी जाए।
- उन्हें इस मुकदमे में जमानत प्रदान की जाए।
अदालती कार्यवाही और जमानत पर आदेश
अदालत में अधिवक्ता विल्सन ने तर्क दिया:
“उदयनिधि स्टालिन एक राज्य सरकार के मंत्री हैं। उनके खिलाफ देश के विभिन्न राज्यों में कई मामले दर्ज हैं। वे हर बार व्यक्तिगत रूप से पेश नहीं हो सकते। इसी प्रकार के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्थायी छूट दे चुका है।”
इस तर्क को सुनते हुए न्यायाधीश शिवकुमार ने कहा:
“इस मामले की अगली सुनवाई 8 अगस्त 2025 को होगी। तब तक आप सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति पेश करें, जिसमें स्थायी छूट दी गई है। उसके बाद स्थायी छूट देने पर निर्णय लिया जाएगा। फिलहाल आप ₹1 लाख का मुचलका जमा कर जमानत ले सकते हैं।”
इसके अनुसार, उदयनिधि स्टालिन ने ₹1 लाख की ज़मानत राशि जमा कर कोर्ट से अंतरिम जमानत प्राप्त की, और फिर वे चेन्नई लौट गए।
राजनीतिक और सामाजिक विवाद की पृष्ठभूमि
उदयनिधि के इस बयान को लेकर पूरे देश में राजनीतिक और धार्मिक बहस छिड़ गई। भाजपा, विश्व हिंदू परिषद और अन्य संगठनों ने इसे हिंदू धर्म पर सीधा हमला बताया, जबकि डीएमके और अन्य द्रविड़ संगठनों ने इसे सामाजिक न्याय और जातिवादी ढांचे के विरुद्ध आवाज बताया।
उदयनिधि ने अपने बयान को स्पष्ट करते हुए कहा था कि उनका उद्देश्य हिंदू धर्म नहीं, बल्कि उस सनातन व्यवस्था का विरोध करना था, जो जातिगत भेदभाव, छुआछूत और असमानता को बढ़ावा देती है। फिर भी कई संगठन इसे धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने वाला बयान मानते रहे।
कानूनी और संवैधानिक मुद्दे
यह मामला अब केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं रहा, बल्कि इससे जुड़े हैं कई संवैधानिक प्रश्न, जैसे:
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) की सीमा क्या है?
- क्या धार्मिक मान्यताओं पर सवाल उठाना अपराध है?
- एक मंत्री या जनप्रतिनिधि की जवाबदेही और मर्यादा क्या होनी चाहिए?
- न्यायालय धार्मिक आलोचना और धार्मिक द्वेष में कैसे भेद करता है?
उदयनिधि की राजनीतिक स्थिति पर असर
मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन के पुत्र और डीएमके के युवा चेहरे उदयनिधि को इस विवाद से राजनीतिक नुकसान भी हुआ है और राष्ट्रीय पहचान भी मिली है। एक ओर वे द्रविड़ राजनीति के उत्तराधिकारी माने जा रहे हैं, दूसरी ओर इस विवाद से वे हिंदुत्व संगठनों के निशाने पर आ गए हैं।
यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी दिनों में वे इस विवाद से कैसे निपटते हैं, और क्या यह मुद्दा उन्हें तमिलनाडु की राजनीति में मजबूत करता है या राष्ट्रीय स्तर पर नुकसान पहुंचाता है।
निष्कर्ष
बेंगलुरु अदालत में पेश होकर जमानत लेने का यह कदम भले ही कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा हो, लेकिन यह इस बात का प्रतीक है कि आज के समय में राजनीतिक बयान कितनी बड़ी कानूनी और सामाजिक प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकते हैं।
8 अगस्त 2025 को होने वाली अगली सुनवाई में यह तय होगा कि उदयनिधि को स्थायी छूट मिलती है या नहीं, और कोर्ट उनके बयानों को सांप्रदायिक विद्वेष की श्रेणी में रखता है या नहीं।
यह प्रकरण भारत में धर्म, राजनीति और अभिव्यक्ति की आज़ादी के जटिल समीकरणों को एक बार फिर उजागर करता है।