भारतीय महासागर: चीन की चुनौती और भारत की नौसैनिक रणनीति
भूमिका
21वीं सदी के आते-आते वैश्विक शक्ति संघर्षों का केंद्र स्थल समुद्री क्षेत्र, विशेष रूप से भारतीय महासागर बन गया है। जहां पहले अटलांटिक और प्रशांत महासागर प्रमुख माने जाते थे, वहीं अब भारतीय महासागर, व्यापार, सुरक्षा और सामरिक दृष्टिकोण से वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र बनता जा रहा है। इस क्षेत्र में चीन की गहरी होती घुसपैठ ने भारत की सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
भारतीय महासागर का महत्त्व क्यों बढ़ा है?
भारतीय महासागर क्षेत्र (Indian Ocean Region – IOR) की विशेषताएँ:
- तीन महाद्वीपों (एशिया, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया) को जोड़ता है।
- इसमें 28 से अधिक देश स्थित हैं।
- विश्व व्यापार का लगभग 70% समुद्री व्यापार यहीं से होकर गुजरता है।
- भारत अपने 95% समुद्री व्यापार और 80% कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए इसी महासागर पर निर्भर करता है।
- यह महासागर अटलांटिक और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाला मुख्य मार्ग है।
इस वजह से चीन, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अन्य शक्तियाँ इस क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती हैं।
चीन की रणनीति: ‘String of Pearls’
चीन ने IOR में अपना प्रभाव जमाने के लिए एक दीर्घकालिक रणनीति अपनाई है, जिसे ‘पियरल्स की माला’ (String of Pearls) कहा जाता है। इसका उद्देश्य है – समुद्री व्यापारिक और रणनीतिक ठिकानों की एक शृंखला बनाना ताकि चीन की नौसेना हर वक्त सक्रिय रह सके।
मुख्य मोती (बिंदु):
- ग्वादर (पाकिस्तान) – चीन-पाक आर्थिक गलियारे (CPEC) का हिस्सा।
- हंबनटोटा (श्रीलंका) – चीन ने 99 वर्षों की लीज़ पर लिया।
- जिबूती (अफ्रीका) – चीन का पहला विदेशी नौसैनिक अड्डा।
- चिट्टागोंग (बांग्लादेश) – चीन द्वारा विकसित।
- कोको द्वीप (म्यांमार) – निगरानी अड्डा।
- सूडान तट – रेड सी में चीन की मौजूदगी।
चीन इन परियोजनाओं को ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI)’ के तहत व्यापारिक कहता है, लेकिन इनमें छिपा सैन्य उद्देश्य स्पष्ट है।
भारत की प्रतिक्रिया: ‘Necklace of Diamonds’
चीन की घेराबंदी की रणनीति के जवाब में भारत ने ‘Necklace of Diamonds’ रणनीति अपनाई है। यह सरकार की आधिकारिक नीति नहीं, बल्कि विशेषज्ञों द्वारा दिए गए नाम का प्रतीक है। भारत IOR में मित्र देशों के साथ सैन्य और रणनीतिक अड्डे विकसित कर रहा है।
प्रमुख बिंदु:
- असंपशन द्वीप (सेशेल्स) – नौसैनिक निगरानी के लिए।
- चाबहार बंदरगाह (ईरान) – मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच।
- डुक्म (ओमान) – मरम्मत और ईंधन आपूर्ति केंद्र।
- सबांग (इंडोनेशिया) – मलक्का जलडमरूमध्य के समीप।
- चांगी नौसैनिक अड्डा (सिंगापुर) – भारत को पहुंच की अनुमति।
साथ ही, भारत ने जापान, वियतनाम, ऑस्ट्रेलिया, मंगोलिया आदि से रक्षा सहयोग भी बढ़ाया है।
भारतीय नौसेना का आधुनिकीकरण
चीन की तेज़ गति से बढ़ती समुद्री ताकत को टक्कर देने के लिए भारत भी अपनी नौसेना को आधुनिक बना रहा है।
विमानवाहक पोत (Aircraft Carriers)
- INS विक्रमादित्य – रूस से खरीदा गया।
- INS विक्रांत – 2022 में भारत में बना पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत।
ये पोत भारत को समुद्र में वायु शक्ति प्रक्षेपण की क्षमता देते हैं।
परमाणु पनडुब्बियाँ (SSBNs)
भारत ने अपनी त्रिआयामी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता पूरी कर ली है – भूमि, वायु और जल के माध्यम से जवाबी हमला करने में सक्षम।
- INS अरिहंत (2016) – K-15 (750 किमी) से K-4 (3,500 किमी) तक उन्नयन।
- INS अरिघाट – बहु-क्षेत्र प्रक्षेपण क्षमता के साथ।
- INS अरिधमन – जल्द ही भारतीय नौसेना में शामिल होने की तैयारी में।
ये पनडुब्बियाँ भारत को दूसरे हमले की शक्ति (Second-strike capability) प्रदान करती हैं।
पारंपरिक पनडुब्बियाँ
- कुल 16 पनडुब्बियाँ, जिनमें से केवल 6 आधुनिक हैं।
- शेष 10 काफी पुरानी हैं (29–34 वर्ष)।
- भारत जल्द ही 6 नई पीढ़ी की पनडुब्बियाँ बनाएगा, जिनमें AIP तकनीक होगी।
नवीन युद्धपोत और फ्रिगेट्स
जनवरी 2024 में प्रधानमंत्री मोदी ने तीन नए युद्धपोत राष्ट्र को समर्पित किए:
- INS वाग्शीर – डीज़ल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी।
- INS सूरत – विध्वंसक पोत।
- INS नीलगिरि (P-17A) – स्टेल्थ फ्रिगेट।
ये सभी भारत में मझगांव डॉक लिमिटेड में बने हैं। हालांकि, चीन महज 10 महीनों में युद्धपोत बना लेता है, जबकि भारत को लगभग 4 साल लगते हैं। परमाणु पनडुब्बी भी चीन 12 महीनों में बना लेता है।
चीन-पाकिस्तान सहयोग: भारत के लिए दोहरा खतरा
चीन न केवल भारत के पूर्व में चुनौती बनता है, बल्कि पश्चिम में पाकिस्तान के साथ मिलकर दोहरा मोर्चा तैयार करता है।
- चीन ने एयर-डिनायल मिसाइल प्रणाली विकसित की है – अमेरिकी पोतों के विरुद्ध।
- इसे पाकिस्तान को देने का भी फैसला किया है।
- साथ ही, पनडुब्बियाँ और नौसैनिक तकनीक भी पाकिस्तान को सौंपी जा रही है।
यह भारत के लिए पूर्व और पश्चिम दोनों मोर्चों पर एक संयुक्त नौसैनिक खतरा बनाता है।
QUAD और बहुपक्षीय रणनीतिक सहयोग
भारत ने अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर QUAD (Quadrilateral Security Dialogue) को मज़बूती दी है।
QUAD के उद्देश्य:
- समुद्री निगरानी और सुरक्षा
- तकनीकी साझेदारी
- चीनी आक्रामकता का मुकाबला
QUAD क्षेत्रीय स्थिरता और ‘फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक’ को समर्थन देता है।
भारत-ऑस्ट्रेलिया संयुक्त रक्षा विज्ञान परियोजना
2024 में भारत और ऑस्ट्रेलिया ने पहली द्विपक्षीय रक्षा वैज्ञानिक परियोजना शुरू की – Undersea Surveillance Initiative।
- भारत की ओर से: DRDO
- ऑस्ट्रेलिया की ओर से: DSTG
उद्देश्य:
- समुद्र के अंदर निगरानी तकनीकों का विकास।
- पनडुब्बी गतिविधियों की पहचान।
- चीनी गतिविधियों पर कड़ी नजर।
यह भारतीय नौसेना के लिए रणनीतिक छलांग है, विशेष रूप से उभरते अंडरवाटर युद्धक्षेत्र को देखते हुए।
भविष्य की चुनौतियाँ और भारत का रास्ता
चीन अभी भी कई मोर्चों पर भारत से आगे है:
- बेहतर गति से निर्माण (युद्धपोत, पनडुब्बियाँ)
- बड़ी नौसैनिक बजट
- वैश्विक बंदरगाहों पर नियंत्रण
- कूटनीतिक दबाव व ऋण-जाल रणनीति
भारत को चाहिए:
- तकनीकी आत्मनिर्भरता (Atmanirbhar Bharat)
- निजी रक्षा क्षेत्र की भागीदारी
- तेज निर्णय प्रणाली
- AI, sonar, cyber warfare में निवेश
निष्कर्ष: भारत का समुद्री पुनरुत्थान
भारतीय महासागर अब केवल व्यापार का मार्ग नहीं रहा — यह रणनीतिक टकराव का मुख्य मंच बन गया है। चीन की रणनीतियाँ भारत को नई सैन्य सोच अपनाने को बाध्य कर रही हैं।
भारत के विमानवाहक पोत, परमाणु पनडुब्बियाँ, बहुपक्षीय सैन्य साझेदारियाँ और समुद्री निगरानी तकनीकें — यह सब मिलकर भारत को आधुनिक समुद्री शक्ति में बदलने की दिशा में ले जा रही हैं।
यदि भारत निरंतर निवेश, नवाचार और कूटनीति को जारी रखे, तो वह निकट भविष्य में भारतीय महासागर में वर्चस्वशाली शक्ति बनकर उभरेगा।