भारत की स्वतंत्रता संग्राम में कई महान नेताओं और क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी। उन सबमें विनायक दामोदर सावरकर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे केवल स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि एक प्रखर सामाजिक सुधारक भी थे। उनके जन्मदिवस के अवसर पर भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य अन्नामलाई ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि सावरकर ने समाज के उत्थान के लिए अथक परिश्रम किया और उनका जीवन वीरता और त्याग का प्रतीक है।
सावरकर ने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण देश की स्वतंत्रता और प्रगति के लिए समर्पित किया। उन्होंने अंडमान के काले पानी की सेलुलर जेल में दस वर्षों से अधिक समय तक कठोर यातनाएं सहीं। उस जेल में उन्हें बिना खिड़की के एक अंधेरी कोठरी में रखा गया था, जहां अमानवीय स्थितियों में उन्हें दिन बिताने पड़े। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी, और उनका साहस आज भी हम सबके लिए प्रेरणा का स्रोत है।
स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ सावरकर सामाजिक सुधारों के लिए भी प्रतिबद्ध थे। उन्होंने जाति प्रथा का खुलकर विरोध किया और दलितों व पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए प्रयास किया। उन्होंने उन बच्चों के लिए स्कूल खोले जो शिक्षा से वंचित थे, और सभी लोगों को मंदिरों में प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष किया। उनका लक्ष्य एक समतामूलक समाज बनाना था जहाँ सभी को समान अधिकार मिले।
सावरकर न केवल एक क्रांतिकारी थे, बल्कि एक विचारक और लेखक भी थे। उन्होंने ‘हिंदुत्व’ की अवधारणा के माध्यम से राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक गौरव का संदेश दिया। उनकी किताबें, भाषण और विचार आज भी सामाजिक जागरूकता और प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं।
अन्नामलाई ने सही कहा कि सावरकर वीरता और त्याग का प्रतीक हैं। उनके जन्मदिवस पर उन्हें याद करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों की याद भी दिलाना है। उनका जीवन हमें प्रेरित करता है कि हम भी देश और समाज के लिए कुछ सार्थक करें।
सावरकर ने केवल विदेशी शासन से लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि भारतीय समाज के भीतर मौजूद सामाजिक बुराइयों से भी संघर्ष किया। उनकी विरासत हमें यह सिखाती है कि एक सशक्त, समतावादी और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए हमें भी प्रयासरत रहना चाहिए।