भारत की सेना द्वारा किए गए अभियान में मारे गए आतंकवादियों के परिवारों को पाकिस्तान सरकार द्वारा प्रति परिवार 1 करोड़ रुपये (करीब 10 मिलियन भारतीय रुपये) मुआवजे के रूप में देने की घोषणा ने हाल ही में भारी विवाद खड़ा कर दिया है। यह घटना उस वक्त सामने आई जब पुलवामा के पास पाहल्गाम में 26 निर्दोष हिंदू नागरिकों की आतंकवादियों द्वारा निर्मम हत्या कर दी गई। इसके जवाब में भारतीय सेना ने “ऑपरेशन सिंधु” नामक तेज़ और निर्णायक कार्रवाई की, जिसमें पाकिस्तान के अंदर स्थित आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया गया। इस ऑपरेशन में सैकड़ों आतंकवादी मारे गए।
इस स्थिति में, भारत की सेना के इन हमलों में मारे गए आतंकवादियों के परिवारों को पाकिस्तान सरकार द्वारा 1 करोड़ रुपये के बराबर मुआवजा देने की घोषणा ने व्यापक आलोचना और विवाद को जन्म दिया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने स्पष्ट किया है कि यह राशि मारे गए आतंकवादियों के वैध वारिसों को दी जाएगी।
इस घोषणा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि इससे मसूद अजहर जैसे वैश्विक रूप से आतंकवादी घोषित व्यक्ति को अप्रत्यक्ष रूप से वित्तीय सहायता मिल रही है। ऑपरेशन सिंधु में मसूद अजहर के 14 करीबी रिश्तेदार मारे गए थे, जिसके कारण पाकिस्तान ने उनके परिवारों को कुल मिलाकर 140 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा देने की योजना बनाई है।
यह कदम भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव को और बढ़ा देता है। भारत इसे आतंकवादियों को प्रोत्साहित करने वाला और आतंकवाद का समर्थन करने वाला प्रयास मानता है और इस नीति की कड़ी निंदा करता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, इस मसले ने संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक सुरक्षा निकायों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है। विशेषज्ञों का कहना है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सहयोग बेहद जरूरी है और आतंकवादियों के परिवारों को मुआवजा देना इस लड़ाई को कमजोर करता है। आतंकवाद को पूरी तरह से समाप्त करने और हिंसा को रोकने पर ही ध्यान देना चाहिए।
यह विवाद भारत की आंतरिक सुरक्षा, विदेश नीति और क्षेत्रीय स्थिरता पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। इस घोषणा से दोनों देशों के बीच राजनयिक तनाव बढ़ सकता है और राजनीतिक एवं सुरक्षा स्तरों पर कड़े रुख देखने को मिल सकते हैं। भारत के अधिकारियों के अनुसार ऑपरेशन सिंधु आतंकवादी गतिविधियों को रोकने में एक महत्वपूर्ण सफलता है, लेकिन पाकिस्तान का यह रुख इस संघर्ष को और बढ़ावा दे सकता है।
इस प्रकार, भारत-पाकिस्तान के पहले से ही नाजुक संबंध एक और खतरनाक दौर में प्रवेश कर सकते हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय संगठनों और संबंधित सरकारों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे स्थिति को संभालने में सावधानी बरतें ताकि स्थिति और बिगड़ने से रोका जा सके और शांति की दिशा में प्रयास जारी रह सकें।
संक्षेप में कहा जाए तो, भारत की सैन्य कार्रवाई आतंकवाद के खिलाफ आवश्यक और न्यायसंगत मानी जाती है, जबकि पाकिस्तान की नीति आतंकवादियों के परिवारों को मुआवजा देने की विवादास्पद घोषणा इस संघर्ष को और जटिल बना रही है। यह घटना क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा पाने की चुनौतियों को दर्शाती है और आतंकवाद के खिलाफ एकजुट वैश्विक प्रयास की आवश्यकता को रेखांकित करती है।