संघर्षविराम वार्ता के बीच रूस ने यूक्रेन पर किया बड़ा ड्रोन हमला
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध 2022 में शुरू हुआ था और यह अब तीसरे वर्ष में प्रवेश कर चुका है। यह युद्ध यूक्रेन द्वारा नाटो (NATO) सैन्य गठबंधन में शामिल होने की कोशिश के कारण शुरू हुआ। रूस ने इसे अपने लिए खतरा मानते हुए यूक्रेन पर व्यापक हमला किया। तब से यह युद्ध लगातार चलता आ रहा है। अमेरिका और यूरोपीय देशों के समर्थन से यूक्रेन अब तक इस संघर्ष में डटा हुआ है।
इस युद्ध ने ना केवल दोनों देशों को बल्कि पूरे विश्व को प्रभावित किया है। हजारों लोग मारे जा चुके हैं, लाखों बेघर हो चुके हैं, और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ा है। ऊर्जा और खाद्यान्न की आपूर्ति में आई कमी ने दुनिया के कई देशों में महंगाई बढ़ा दी है।
इस स्थिति में हाल ही में यूरोपीय संघ के नेता यूक्रेन गए और रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत की पहल की। उन्होंने रूस को चेतावनी दी कि अगर युद्ध नहीं रुका तो उस पर और कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाएंगे। इसके बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने शांति वार्ता के लिए सहमति जताई और तुर्की के इस्तांबुल शहर में बातचीत की योजना बनाई गई।
यूक्रेन ने वार्ता के दौरान अस्थायी संघर्षविराम की मांग की, लेकिन राष्ट्रपति पुतिन ने इसे खारिज कर दिया। इसके बावजूद, निर्धारित समय पर इस्तांबुल में वार्ता हुई, लेकिन किसी ठोस समझौते पर पहुंचा नहीं जा सका। इसी बीच, रूस ने यूक्रेन की राजधानी कीव पर एक बड़े पैमाने पर ड्रोन हमला कर दिया।
इस हमले में एक ही दिन में 245 ड्रोन कीव की ओर भेजे गए, जो अब तक के सबसे बड़े ड्रोन हमलों में से एक माना जा रहा है। कई आवासीय और व्यावसायिक भवनों में आग लग गई और 15 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। आपातकालीन सेवाओं ने घायलों को बचाया और अस्पताल में भर्ती कराया।
यह हमला ऐसे समय हुआ जब दोनों देशों के बीच वार्ता चल रही थी, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश फैल गया। यूक्रेन ने इस हमले को “वार्ता को विफल करने की सोची-समझी चाल” बताया। राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने कहा कि रूस केवल दिखावे के लिए शांति वार्ता कर रहा है जबकि असल में युद्ध को जारी रखने की योजना बना रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह हमला शांति प्रयासों को पटरी से उतार सकता है और युद्ध को और अधिक भयावह बना सकता है। इससे यह साफ होता है कि अभी भी युद्ध की भाषा कूटनीति की तुलना में अधिक प्रभावी सिद्ध हो रही है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस स्थिति में कैसे हस्तक्षेप करता है और क्या दोनों देश फिर से बातचीत की मेज पर लौटते हैं या युद्ध और अधिक उग्र रूप लेता है।